रम्माण कौथिग, सांस्कृतिक विश्व विरासत (UNESCO)
उत्तराखंड
में रामायण, महाभारत काल के सेकड़ों कथाये मौजूद हैं, जिनमे से कई कथाये विलुप्त हो गयी है और कई कथाये विलुप्त होने के कगार पे पहुंच चुकी है|
उत्तराखंड में कई लोगो के अथक प्रयासों से लोगो ने यहां की संस्कृति को आज भी ज़िंदा रखा है, और उत्तरखंड को पूरे विश्व में अलग पहचान दिलाई है |
चाहे वह विश्व की सबसे लम्बी पैदल यात्रा नंदा राजजात यात्रा हो या फिर चम्पावत के देवीधुरा में प्रसिद्ध बग्वाल युद्ध, जो पीढ़ी - दर पीढ़ी चली आ रही है जो हमे उत्तरखंड की लोक संस्कृति से रूबरू कराती है | साथ ही वर्षो पुरानी सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने का प्रयास भी करते हैं|
ऐसे ही अनेक लोक संस्कृति उत्तराखंड के सुदूर पहाड़ी क्षेत्र में आज भी जीवित हैं जिसमे एक नाम आता है, रम्माण जिसे यहाँ की सांस्कृतिक विरासत के रूप में यहाँ के लोगो द्वारा जीवित रखा गया है|
आइये जानते है रम्माण के बारे में |
रम्माण
नृत्य शैली
रम्माण उत्त्सव में जिस नृत्य शैली का उपयोग किया जाता है वह मुखौटा नृत्य शैली है | इसमें नृत्यक अपने मुख पे रंग बिरंगे मुखौटा पहन कर नृत्य करते है |
इसमें कोई भी संवाद पात्रों के बीच नहीं होता है ये पात्र ढोल - दमाऊ, भंकोरो के धुन पे नृत्य करते हैं|
मुखौटों के दो रूप होते हैं |
पहला -: पत्तर यानि देवताओ के मुखोटे |
दूसरा -: ख्यलारी पत्तर यानी मनोरंजन के मुखोटे |
रम्माण के विशेष नृत्य
बण्या- बण्याल -: यह नृत्य तिब्बत के व्यापारियों पर आधारित, जिस में उन पर हुए चोरी व लूटपाट की घटना का विवरण नृत्य के माध्यम से किया जाता है|
म्योर - मूरेण : यह नृत्य पहाड़ की दैनिक परेशानियों जैसे - पहाड़ो पर घास और लकड़ी काटने के लिये जाते समय जंगली जानवरो द्वारा किये जाने वाले आक्रमण का चित्रण होता है |
माल - मल्ल -: इस नृत्य में स्थानीय लोग व गोरखाओं के बीच हुए युद्ध का वर्णन होता है |
कुरु जोगी -: जो यहाँ का सबसे हास्य किरदार के रूप में देखा जाता है यह हास्य नृत्य है जो अपने पुरे शरीर पर चिपकने वाली घास जिसे स्थानीय भाषा में (कुरु ) कहते है उसे लगाकर लोगो के बीच चला जाता है | कुरु चिपकने के भय से लोग इधर - उधर भागते हैं| लेकिन कुरु जोगी उन पर अपने शरीर से कुरु निकाल कर लोगो पर फेंकता है|
रम्माण कौथिग जोशीमठ ब्लॉक के सलूड़- डुंग्रा ग्राम में होता है हर वर्ष आयोजित होने वाला रम्माण का शुभ - मुर्हूत बैशाखी पर्व पर निकाला जाता है |
यहाँ के गाँव वाले रम्माण मेले को बड़े धूम धाम से कराते है | यह मेला कभी 11 दिन तो कभी 13 दिन तक मनाया जाता है इस मेले में विविध कार्यक्रमों, पूजा ,अनुष्ठानो की श्रृंखला होती है इसमें सामूहिक पूजा ,देवयात्रा, लोकनाट्य, नृत्य, गायन, मेला आदि आयोजन होते है|
यह सभी ग्राम क्षेत्र के देवी - देवताओ से भेट करने का मौका होता है |
सभी क्षेत्र के लोग इस मेले को देखने दूर- दूर से आते है यह इस क्षेत्र का प्रसिद्ध मेला है, जिसे
2 अक्टूबर 2009 को यूनेस्को ने रम्माण उत्सव को सांस्कृतिक विश्व धरोहर घोषित किया है|
2016 में रम्माण उत्सव की झांकी उत्तराखंड के द्वारा दिल्ली में गणतंत्र दिवस के मोके पर प्रदर्शित की गयी है |






No comments:
Post a Comment
If you have any doubts. Please let me know