"खिरो घाटी"
Khiro Valley the ultimate and untouched full of alpine meadows.
उत्तराखंड राज्य में बसा सुदूर हिमालय के ऊपरी क्षेत्र में एक छोटा सा गाँव है जो साल के 6 महीने बर्फ की पहाड़ियों से घिरा रहता है|
"खिरो गाँव"
खीरो गाँव भारत के हिमालयी राज्य उत्तराखंड के चमोली जिले के जोशीमठ ब्लॉक में स्थित है,जो की भारत चीन सीमा माना दर्रे से 65 किलोमीटर पहले आता है| खीरो गाँव के नीचे बेनाकुली के पास अलकनंदा और खीरो गंगा का संगम होता है,
यहाँ के लोग मौसमी प्रवास में अंत:घाटी प्रवास करते है, जिसकी अवधि 4 माह की होती है,यहाँ के लोग गाँव में अपनी आजीविका व पशुओं को चराने के लिए आते है |
यह गाँव NH- 58 पर बेनाकुली नामक स्थान से 4 किलोमीटर की पैदल दूरी पर है, इस गाँव में पहुंचने के लिए आज भी यहाँ के लोग पैदल कच्ची सड़क और अलकनंदा को पार कर के गाँव में पहुंचते है, इस गाँव में हिन्दू धर्म के लोग निवास करते है|
इस गाँव में माता उन्याणी का एक बहुत बड़ा मंदिर है जो गाँव की अधिष्ठात्री देवी हैं |
"माता उन्याणी का मंदिर ऊपर से लिया गया चित्र "
"माता उन्याणी के मंदिर में टंगवाड़ा जागर (पूर्णमासी मेला ) के दिन लिया गया चित्र "
प्राचीन काल में देवी का "उना" नामक घास का दिव्य मंदिर (छप्पर का) हुआ करता था जिस कारण देवी का नाम उन्नयाणी पड़ा अर्थात उना नामक घास के कक्ष में रहने वाली उन्नयाणी देवी ।।
हर साल सितम्बर के महीने और पूर्णमासी के दिन यहाँ पूर्णमासी का, एक दिन का बहुत बड़ा मेला लगता है, माता उन्याणी के दर्शन के लिए दूर - दूर से लोग यहाँ आते हैं | माता की आस्था भक्तो में इतनी है, कि हर साल यहाँ हजारो की भीड़ आती है और यह हर साल बढ़ती जा रही है | माता के दर्शन करने के बाद यहाँ के लोग प्रचलित नृत्य दाकुड़ी (झुमैलो) लगाते है और माता को खुश किया जाता है | इस नृत्य को यहाँ आये सभी भक्त मंदिर के परिसर में एक गोल घेरा बना कर करते है | यह नृत्य यहाँ का सबसे प्रचलित और पारम्परिक लोक नृत्य है |
"गाँव वालो द्वारा पारम्परिक लोक नृत्य दाकुड़ी "
इस मेले में लोग रंग बिरंगे कपडे पहन कर यहाँ आते है, यह मेला हर साल बड़े भव्य रूप से गाँव वालो द्वारा मनाया जाता है, माता के प्रति लोगो की आस्था इतनी है की यहाँ दूर दूर से पैदल चल कर भक्त, माता उन्याणी के दर्शन के लिए आते है | यहाँ पर गाँव वालो के द्वारा भंडारे की व्यवस्था भी की जाती है, जो श्रद्धालु माता के दर्शन करने आते है उन्हें यह प्रसाद दिया जाता है,
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Video- BY - Yogesh bhandari
Editing- Banktesh bhandari
Thanks To Chala Mera Pahad - Bunty
"माँ उन्याणी के भक्तो के लिए प्रसाद बनाते गाँव के युवा "
" माँ उन्याणी द्वारा जलाभिषेक करते हुए दूध से "
इस मेले में माता उन्याणी द्वारा दूध और जल से गाडू (स्नान ) लिया जाता है, जिसे देखने लोग आते है और माता के सर पे मक्खन से लेप लगाया जाता है व सभी श्रद्धालु प्रसाद के रूप में माता के चरणों से जल और सर पे लगाया हुआ माखन प्रसाद के रूप में प्राप्त करते हैं |
"फूल और मक्खन से माता का श्रृंगार "
माता उन्याणी को यहाँ फूल के रूप में ब्रह्मकमल चढ़ाया जाता है जो की यहाँ के लोगो द्वारा रिंगाल से बनी हुई कण्डी में उच्च हिमालयी क्षेत्रों से लाया जाता है |
"गाँव वालो द्वारा कण्डी में लाया गया माता के लिए ब्रह्मकमल "
"ब्रह्मकमल"
खीरो गाँव से 10 किलोमीटर दूर चढाई कर के उन्याणी ताल एक छोटी सी झील है, समुद्र तल से इसकी ऊंंचाई 3700 मीटर है । यह त्रिकोण आकार का ताल है |
"उन्याणी ताल"

यहाँ के लोग रक्षा बंधन के दिन उन्याणी ताल घूमने के लिए जाते है और उन्याणी ताल में स्नान कर के माँ उन्याणी की पूजा करते है,व उसके बाद एक दूसरे की कलाई पर राखी बांधते हैं|
इस ताल को देखने के लिए लोग दूर- दूर से आते हैं | यह झील इतनी साफ़ है की इस झील में कुछ भी गंदगी नहीं पायी जाती है, इस झील के किनारे पक्षियों और तितलियों की अनेक प्रजातियां पायी जाती हैं और यहाँ वन्य जीव में कस्तूरी हिरन, नील गाय, भालू ,हिम तेंदुवा , और यहाँ के गाँव वालो ने सफ़ेद भालू को भी इन जंगलो में देखा है, और विभिन्न प्रकार के फूल पाए जाते है, लोगो का मानना हैं की यहाँ की पक्षिया इस झील को साफ़ करती हैं और झील में आये पत्तो को हटाती है | इस झील के निचले किनारे से खीरो गंगा का उद्गम स्थान हैं |
उच्च हिमालयी क्षेत्र होने के बाद भी यह पूरी घाटी जैव विविधता से परिपूर्ण है | फूलो की घाटी की तर्ज पर इस घाटी को भी पर्यटन हेतु बढ़ावा दिया जा सकता है |
"रक्षा बंधन के दिन उन्याणी ताल घूमने के लिए जाते हुये गाँव के युवा "
यह ताल एक आकर्षक घाटी में स्थित हैं | यहाँ का मुख्य आकर्षण बड़े- बड़े बुग्याल , बर्फ के पहाड़ और अनेक प्रकार के फूल है|
" बुग्याल "
"खीरो घाटी में फूलो की विभिन्न प्रकार की प्रजाति पायी जाती हैं
खीरो घाटी से ट्रैक
1-:खीरो-पनपतिया-मद्महेश्वर -गौंडार-रांशी ट्रैक
2-:खीरो-नीलकंठ-बद्रीनाथ ट्रैक
" मद्महेश्वर ट्रैक"
इस स्थान से सैलानियों द्वारा मद्महेश्वर का ट्रैक किया जाता हैं| खीरो गंगा के ऊपर बड़े -बड़े ग्लेसियर (बांक) फैले हैं, जिसके ऊपर से सैलानियों द्वारा हर साल मद्महेश्वर की यात्रा की जाती है, खीरो - मद्महेश्वर ट्रैक की कुल दूरी 45 से 50 किलोमीटर है |मद्महेश्वर उत्तराखंड के पांच केदारो में से एक केदार है जो,रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है|
"खीरो-नीलकंठ-बद्रीनाथ ट्रैक "
बेनाकुली - खीरो - नीलकंठ - बद्रीनाथ ट्रैक की कुल दूरी 30 किलोमीटर है | खीरो घाटी से लोग नीलकंठ होते हुए बद्रीनाथ के दर्शन करने जाते है और वहां से भी लोग माता उन्याणी के दर्शन के लिए इस रास्ते से आते हैं |
"नीलकंठ - पर्वत "
"बकरिया बुग्यालों में चरते हुये"
इस घाटी में बड़े- बड़े बुग्याल है, जहाँ चरवाहे (पालसी) अपनी भेड़, बकरियों को ग्रीष्मकाल में चराने के लिए लाते है व शीतकाल में अपने शीतकालीन निवास स्थानों में लौट जाते है | चार महीने चरवाहे (पालसी) लोग सचल आवास (टैंट ,गुफा ) बनाकर बुग्यालों में रहते है | पनपतिया लोंथरा, द्यु खर्क , टाली, गाडी, यकेति , छडार , लोदी , लोकमारा , मातपाटा, बारमा-गेठा ,तातापानी, कंजाला जो खीरो घाटी के मुख्य खर्क (बुग्यालों में बकरियों व चरवाहों का रुकने का स्थान) हैं |
इस क्षेत्र में अनेक जड़ी बुटिया और अनेक प्रकार के फूल पाए जाते है, इस वैली को खिरोई वैली ऑफ फ्लावर के रूप में भी जाना जाता है|
यहाँ पायी जाने वाली जड़ी बूटी में मुख्य रूप से कीड़ा जड़ी , हत्था जड़ी, बालछड़ी, कड़वे, शंकजड़ी, चोरु,फर्र्न, पाए जाते है, जिसका मुख्य काम घरेलु औषद्यि बनाने में किया जाता है|
कीड़ा जड़ी
धन्यवाद
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#Tourism
#Mountain






























बहुत ही सुंदर जानकारी आपके द्वारा साझा की गई। हमें उम्मीद है पहाड़ से पहाड़ी ऐसे अच्छे-अच्छे ब्लॉग हमसे साझा करते रहेंगे। वास्तव में हिमालय में ऐसे -ऐसे सुंदर स्थान है, जिनके बारे में हम उत्तराखंडी होकर भी अनभिज्ञ है। और दूर-दूर से सैलानी यहां ट्रैकिंग करके वापस चले जाते हैं।
ReplyDeleteआपका बहुत-बहुत धन्यवाद।
Thanku.
DeleteVery informative!
ReplyDeleteबहुत सुंदर 👌
ReplyDeleteBahut rochak jankari.... Abhi tak is chetra se anjan the.. .
ReplyDeleteKeep it up ma'am.
Thanku sir
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