भाद्रपद मास की संक्रान्ति, जिस दिन सूर्य सिंह राशि में प्रवेश करता है और जिसे सिंह संक्रांति कहते हैं,
घी-त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। इस दिन सभी घी का सेवन अवश्य करते हैं और परंपरागत मान्यता है कि जो इस दिन घी नहीं खाता उसे अगले जन्म में घोंघे के रूप में पैदा होना पड़ता है।
यह त्यौहार भी हरेले की ही तरह ऋतु आधारित त्यौहार है| हरेला जिस तरह बीज को बोने और वर्षा ऋतू के आने के प्रतीक का त्यौहार है |वही “घी त्यार” अंकुरित हो चुकी फसल में बालिया के लग जाने पर मनाये जाने वाला त्यौहार है
यह खेती बाड़ी और पशु के पालन से जुड़ा हुआ एक ऐसा लोक पर्व है |
जो की जब बरसात के मौसम में उगाई जाने वाली फसलों में बालियाँ आने लगती हैं ।
तो किसान अच्छी फसलों की कामना करते हुए ख़ुशी मनाते हैं।
फसलो में लगी बालियों को किसान अपने घर के मुख्य दरवाज़े के ऊपर या दोनों और गोबर से चिपकाते है |
इस त्यौहार के समय पूर्व में बोई गई फसलों पर बालियां लहलहाना शुरु कर देती हैं।
साथ ही स्थानीय फलों, यथा अखरोट आदि के फल भी तैयार होने शुरु हो जाते हैं।
पूर्वजो के अनुसार मान्यता है कि अखरोट का फल घी-त्यार के बाद ही खाया जाता है । इसी वजह से घी तयार मनाया जाता है |





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ReplyDeleteThanku
DeleteThanks
DeleteThanks for sharing traditional knowledge of uttarakhand. Its been very important now a days.
ReplyDeleteThanks
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