बद्रीनाथ धाम की कुछ रोचक जानकारी
बद्रीनाथ धाम
बहूनि सन्ति तीर्थानि, दिविभूमौ रसासु च। बदरी सदृशं तीर्थ, न भूतो न भविष्यति।।
अर्थात
धरती पर हर दिशा और स्थान में बहुत से तीर्थ हैं लेकिन बदरीनाथ जैसा तीर्थ न तो पहले कभी था और न भविष्य में होगा।
श्री बद्रीनाथ जी उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल के अन्तर्गत सीमान्त जनपद चमोली की तहसील - जोशीमठ मे अलकनन्दा एवं ऋषिगंगा नदी के संगम पर, नर - नारायण पर्वत श्रृंखलाओ की तलहटी मे बसा पवित्र आस्था का धाम है, यह धाम समुद्र तल से 10244 फुट (3133 मीटर ) की ऊंचाई पर 30 डिग्री - 44 मिनट - 56 सेकंड उत्तरी अक्षाँश एवं 79 डिग्री 31 मिनट 20 सेकंड पूर्वी देशांतर के मध्य स्थित है|
बद्रीनाथ धाम उत्तराखंड का ही नहीं बल्कि भारत के चार धामों मे से एक धाम है और वैष्णव धर्म के लोगो का सबसे पवित्र मंदिर है। यह वैष्णव के 108 दिव्य देसम में प्रमुख है।
बद्रीनाथ मंदिर में भगवान विष्णु की शालिग्राम की शिला प्रतिमा है, जो की जगतगुरु शंकराचार्य जी द्वारा नदी के किनारे नारद कुंड से निकाली गयी थी ,जो एक काले शालिग्राम से बनी चतुर्भुज आकर की ध्यान लगाए हुए श्री विष्णु जी
की 1.3 फीट ऊंची शिला है और जो भगवान की सबसे शुभ स्वयं-प्रकट मूर्तियों में से एक है।
"सृष्टि का दूसरा वैकुंठ भी कहलाता है बद्रीनाथ"
भगवान के गर्भ गृह मे बिराजमान मूर्ति |
सबसे पहले मध्य मे भगवान विष्णु जो शालिग्राम की शिला मे चतुर्भुज रूप मे ध्यान लगाए बैठे है|भगवान बिष्णु के दाहिने से धन के देवता कुबेर जी |
कुबेर जी के ठीक बाए हाथ जोड़े गरुड़ भगवान जी |
भगवान विष्णु के ठीक बाए बगल मे उद्धव जी |
उद्धव जी के ठीक सामने नारद जी |
व उद्धव जी के बाए नारायण और नर की मूर्ति है |
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बद्रीनाथ मंदिर मे जाने के लिए तीन द्वार है|
सामने ,दांया और बांया
बद्रीनाथ मंदिर के परांगण के सामने दरवाजे के दांये से घंटाकर्ण का एक छोटा सा मंदिर है|
और बाए से हनुमान जी की मूर्ति है|
हनुमान के बाए मे लक्ष्मी जी का मंदिर है
श्रद्धा एवं आस्था का प्रतीक बद्रीनाथ मंदिर विष्णु गंगा अलकनंदा नदी के दाएं तट नारायण पर्वत की तलहटी पर सातवीं शताब्दी में निर्मित हुआ था।
बद्रीनाथ की दूरी जनपद मुख्यालय गोपेश्वर से 110 किलोमीटर , मंडल मुख्यालय पौड़ी से 226 किलोमीटर एवं उत्तराखंड प्रदेश की स्थाई राजधानी देहरादून से 345 किलोमीटर है।नगर में आवागमन सड़क मार्ग द्वारा होता है जबकि निकटतम रेलवे स्टेशन ऋषिकेश एवं कोटद्वार की दूरी क्रमशः 300 एवं 320 किलोमीटर है।
अलकनंदा नदी बद्रीनाथ नगर के मध्य में उत्तर से दक्षिण की ओर बहती है इसके पश्चिम में स्थित पर्वत श्रृंखला नारायण पर्वत एवं पूर्व में नर पर्वत कहलाती है।
नारायण पर्वत के ठीक ऊपर नीलकंठ शिखर है जहां से ऋषि गंगा नदी निकलकर पूर्व की ओर ग्राम बामणी में अलकनंदा नदी से मिल जाती है।
समुद्र तल से अधिक ऊंचाई पर स्थित होने के कारण नगर की जलवायु काफी ठंडी रहती है। यहां पर सर्दियों का तापमान 0 डिग्री सेल्सियस से नीचे चला जाता है यही कारण है कि इस अवधि में जनजीवन शून्य हो जाता है।
बद्रीनाथ मंदिर के कपाट अक्टूबर-नवंबर माह से 6 महीने के लिए बंद कर दिए जाते हैं
तथा पुनः अप्रैल माह में खोल दिए जाते हैं जिससे इस क्षेत्र में फिर से आवागमन होने लगता है। इस दौरान बद्रीनाथ क्षेत्र की संपूर्ण स्थाई जनसंख्या अपने शीतकालीन आवास को लौट जाती है।ग्रीष्म काल बद्रीनाथ में काफी सुहावना रहता है यहां का अधिकतम तापमान 20 डिग्री तक चला जाता है|वर्षा ऋतु में वर्षा सामान्य होती है एवं सितंबर माह में पुनः सुहावना मौसम यहां पर हो जाता है।बद्रीनाथ की यात्रा का समय छह माह का होता है,जो अप्रैल से शुरू होता है और नवंबर के महीने में समाप्त होता है।
बद्रीनाथ जी का उद्भव एवं विकास
इस स्थान का नाम बद्रीनाथ पढ़ने का यह मत है कि सीमांत ग्राम माणा से 4 किलोमीटर पहले अलकनंदा नदी के बाएं तट पर नारायण पर्वत की तलहटी पर जब भगवान विष्णु तपस्या कर रहे थे तो लक्ष्मी जी ने उनकी सेवा करनी चाही, लेकिन उनको आभास हुआ कि कहीं उनकी सेवा भाव से भगवान विष्णु की तपस्या में कोई बाधा ना पड़ जाए अतः यह विचार कर, लक्ष्मी जी ने बद्री वृक्ष यानी की बेर के वृक्ष का रूप धारण कर लिया व तुषार, वर्षा, धूप आदि से भगवान को छाया प्रदान कर उनकी तपस्या में सहयोग प्रदान किया।
जब भगवान विष्णु की तपस्या पूर्ण हुई तो उन्होंने लक्ष्मी जी को बदरी बेर वृक्ष के रूप में देखा और लक्ष्मी जी को वरदान दिया कि तुम्हारे इस रूप का नाम मेरे नाम से पहले आएगा। फलस्वरुप भगवान विष्णु को इस स्थान पर बद्रीनारायण के रूप में जाना व पूजा जाता है।
इस तपस्या स्थल पर विक्रमी संवत 76 के आसपास सातवीं शताब्दी में मंदिर का निर्माण कार्य किया गया। पुनः जगतगुरु शंकराचार्य जी ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था।यह भी मान्यता है कि बौद्धों ने भगवान की मूर्ति को सामने स्थित नारद कुंड में फेंक दिया था जिसे फिर से जगतगुरु शंकराचार्यजी द्वारा स्थापित किया गया। मंदिर की ऊंचाई लगभग 30 फुट है।
मंदिर परिसर के आस - पास अन्य दर्शनीय स्थल
पंचशिला
यह सभी पवित्र शिला बद्रीनाथ मंदिर के नीचे स्थित है इनमें से प्रमुख शिलाओं के नाम है
गरुड़ शिला
नारद शिला
मारकंडेय शिला
नरसिंह शिला
वराह शिला
पंचधारा
बद्रीनाथ क्षेत्र में अलग-अलग स्थानों पर बहती है
प्रहलाद धारा (गर्म धारा)
कुर्मी धारा
उर्वशी धारा
भृगुधारा
इंद्र धारा
पंचकुंड
बद्रीनाथ क्षेत्र मे पाँच कुंड स्थित है, इनका जल गर्म व ठंडा दोनों है।
तप्त कुंड (गर्म कुंड)
सूर्य कुंड (गर्म कुंड)
चंद्र कुंड (गर्म कुंड)
नारद कुंड (ठंडे कुंड)
उर्वशी कुंड (ठंडे कुंड)
बामणी ग्राम
मंदिर के दक्षिण में कुछ ही दूरी पर ग्राम बामणी की मुख्य आबादी है।मंदिर एवं ग्राम बामणी के मध्य पट्टी नुमा सड़क के दोनों और मुख्य व्यवसाय गतिविधियां कार्यरत हैं। अलकनंदा नदी के पूर्व में विकास योग्य भूमि उपलब्ध होने से इस भाग में अनेक बड़ी धर्मशालाएं, कार्यालय एवं पर्यटक गतिविधियों का विकास हुआ है।
इसके पार्श्व भाग में पंडा लोगों का मुख्य निवास स्थान है जिनके स्थाई आवास देवप्रयाग में है तथा बामणी गांव के लोगों का स्थाई आवास पांडुकेश्वर ग्राम में है।
योगध्यान बद्री-पांडुकेश्वर
पांडुकेश्वर ग्राम में बद्रीनाथ जी की शीतकालीन पूजा होती है।
बद्रीनाथ से २० किलोमीटर नीचे पांडुकेश्वर ग्राम में योगध्यान बद्री का मंदिर है यहाँ पर बद्री नारायण की शीतकालीन पूजा 6 माह के लिए होती है |
भगवन के गर्भ गृह में स्थित नर - नारायण की मूर्ति के बारे मे हम थोड़ा जानकारी प्राप्त कर लेते हैं|
बद्रीनाथ मंदिर का धार्मिक महत्व अपने पौराणिक वैभव और ऐतिहासिक मूल्य से जुड़ा हुआ है, यह एक प्राचीन मंदिर है|
आपने नर और नारायण का नाम तो सुना ही होगा। भारत का शिरोमुकुट हिमालय है, जो समस्त पर्वतों का पति होने से गिरिराज कहलाता है उसी के एक उत्तुंग शिखर के प्रांगण में बद्रिकाश्रम या बदरीवन है। वहाँ पर इन चर्म चक्षुओं से न दीखने वाला बदरी का एक विशाल वृक्ष है,बदरी वृक्ष में लक्ष्मी का वास है, इसीलिये लक्ष्मीपति को यह दिव्य वृक्ष अत्यन्त प्रिय है। उसकी सुखद शीतल छाया में भगवान् ऋषि मुनियों के साथ सदा तपस्या में निरत रहते हैं। बदरी वृक्ष के कारण ही यह क्षेत्र बदरी क्षेत्र कहलाता है और नर-नारायण का निवास स्थान होने से इसे नर-नारायण या नारायणाश्रम भी कहते हैं।
सृष्टि के आदि में भगवान् ब्रह्मा ने अपने मन से 10 पुत्र उत्पन्न किये। ये संकल्प से ही अयोनिज उत्पन्न हुए थे, इसलिये ब्रह्मा के मानस पुत्र कहाये। उनके नाम मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वशिष्ठ, दक्ष और नारद है। इनके द्वारा ही आगे समस्त सृष्टि उत्पन्न हुई। इसके अतिरिक्त ब्रह्माजी के दायें स्तन से धर्मदेव उत्पन्न हुए और पृष्ठ भाग से अधर्म। अधर्म का भी वंश बढ़ा।
ब्रह्माजी के पुत्र दक्ष प्रजापति का विवाह मनु पुत्री प्रसूती से हुआ। प्रसूति में दक्ष प्रजापति ने 16 कन्यायें उत्पन्न की। उनमें से 13 का विवाह धर्म के साथ किया। एक कन्या अग्नि को दी, एक पितृगण को, एक भगवान् शिव को। जिनका विवाह धर्म के साथ हुआ उनके नाम - श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्नति, बुद्धि मेधा, तितिक्षा, ही और मूर्ति। धर्म की ये सब पत्नियाँ पुत्रवती हुई। सबने एक एक पुत्र रत्न उत्पन्न किया। जैसे श्रद्धा ने शुभ को उत्पन्न किया, मैनी ने प्रसाद को, दया ने अभय को, शान्ति ने सुख को, तुष्टि ने मोद को, पुष्टि ने अहंकार को, क्रिया ने योग को उन्नति ने दर्प को, पुद्धि ने अर्थ को, मेधा ने स्मृति को, तितिक्षा ने क्षेम को, और ही (लल्जा) ने प्रश्रय (विनय) को और सबसे छोटी मूर्ति देवी ने भगवान् नर-नारायण को उत्पन्न किया।
क्योंकि मूर्ति में ही भगवान् की उत्पत्ति हो सकती है। वह मूर्ति भी धर्म की ही पत्नी है। नर-नारायण ने अपनी माता मूर्ति की बहुत अधिक बड़ी श्रद्धा से सेवा की। अपने पुत्रों की सेवा से सन्तुष्ट होकर माता ने पुत्रों से वर माँगने को कहा। पुत्रों ने कहा-’’माँ, यदि आप हम पर प्रसन्न हैं तो वरदान दीजिये कि हमारी रूचि सदा तप में रहे और घरबार छोड़कर हम सदा तप में ही निरत रहें।’’ माता को यह अच्छा कैसे लगता कि मेरे प्राणों से भी प्यारे पुत्र घर-बार छोड़कर सदा के लिये वनवासी बन जायँ, किन्तु वे वचन हार चुकी थी। अतः उन्होंने अपने आँखों के तारे आज्ञाकारी पुत्रों को तप करने की आज्ञा दे दी। दोनों भाई बदरिकाश्रम में जाकर तपस्या में निरत हो गये। बदरिकाश्रम में जाकर दोनों भाई घोर तपस्या करने लगें इनकी तपस्या के सम्बन्ध में पुराणों में भिन्न-भिन्न प्रकार की कथायें हैं।
श्रीमद्भागवत में कई स्थानों पर भगवान् नर-नारायण का उल्लेख है। देवी भागवत के चतुर्थ स्कन्द में तो नर-नारायण की बड़ी लम्बी कथा है। नर और नारायण भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए केदारखंड में उस स्थान पर तपस्या करने लगे जहां पर आज ब्रदीनाथ धाम है।
"बद्री-नारायण के दर्शन से पूर्व तप्त कुंड मे स्नान"
बद्रीनाथ मंदिर मे पहुंचने से पहले सभी भक्त स्नान के लिए तप्त कुंड के पास पहुंचते हैं | तप्त कुंड का गर्म जल भगवान बद्री विशाल के चरण कमलो से निकलता है|
सभी भक्त यहाँ स्नान करने के पश्चात भगवान नारायण के दर्शन हेतु जाते है व प्रसाद के रूप मे पंचमेवा और बद्री बन से लाई गयी तुलसी की माला भगवान के लिए लेते है |
तुलसी की माला यहाँ के स्थानीय लोगो को रोजगार प्रदान करती है| बद्री नारायण को तुलसी के बिना कोई भी भोग - प्रसाद नहीं चढ़ता है|
या यूँ कहे बद्री नारायण तुलसी के बिना कोई भी भोग स्वीकार नहीं करते हैं|
बद्रीनाथ जी का भोग एवं प्रसाद
भगवान् बद्री नारायण को तुलसी माला और पंचमेवा प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाता है |
भगवान् बद्री नारायण को केसर से बनाया भात भोग लगता है
बद्रीनाथ मंदिर के पास एक ऐसा स्थान जहाँ पर होते है पित्रो के श्राद्ध ब्रम्हाकपाल
बद्रीनाथ मंदिर के पास स्थित ब्रम्हाकपाल पूरे विश्व मे एकमात्र ऐसा स्थान है, जहाँ पर लोग अपने पित्रो का श्राद्ध करने के लिए आते है, पुराणों मे ये मान्यता है, की, यहाँ पर एक बार पिंडदान करने से उसके सात पीड़ी को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है,, यहाँ पर श्राद्ध पक्ष मे लोगो के द्वारा अपने पित्रो के पिंड -दान किये जाते है |
बद्रीनाथ के अन्य दर्शनीय स्थल
परमार्थ लोक
शेष नेत्र झील
चरण पादुका
लीला ढुगीं
नंदा देवी मंदिर
उर्वशी मंदिर
व्यास गुफा
गणेश गुफा
मुचकुंद गुफा
भीम पुल
वसुधारा
माना ग्राम
माता मूर्ति
सतोपंथ
देवताल
नागतल
आदि स्थान है|
माता मूर्ति
प्रतिवर्ष अपनी माँ से भेंट करने जाते हैं प्रभु
माँ को कोई नही भूल सकता स्वयंप्रभु भी।
(माता मूर्ति) श्रीमद् भागवत के अनुसार दक्ष की 16 कन्याओ में से एक थी मूर्ति देवी जिनका विवाह धर्म से हुआ था एवं यें दम्पत्ति ही नर-नारायणजी के माता पिता हैं । सहस्त्रकवच के वध के लिए स्वयं बदरीनाथजी धर्मनंदन (मूर्तिनंदन) के रूप में प्रकट होते हैं ।
प्रतिवर्ष बदरीनाथजी वामनद्वादशी के स्वर्णिम अवसर पर अपने भक्तों के साथ डोली में विराजमान हो कर इस स्थान पर आते हैं और क़रीब 4घंटो तक यही निवास करते हैं और दोपहर का भोग अपनी माँ के साथ यही पाते हैं | इस वर्ष बदरीनाथ में इस दिव्य स्थान का दर्शन ज़रूर करे |
अलकनन्दा और सरस्वती के संगम के किनारे बसा माणा गाँव
बद्रीनाथ से 4 किलोमीटर की दूरी पर अलकनंदा और सरस्वती नदी के संगम पर बसा भारत
चीन -सीमा (माणा पास ) का यह अंतिम गाँव है| साल के सिर्फ ६ महीने यहाँ के लोग अपनी आजीविका के लिए इस गाँव मे आते है|
इस गाँव मे उत्तराखंड की पांच जनजातियों मे से एक जनजाति - भोटिया निवास करती है |जिनके द्वारा मुख्य रूप से ऋतु प्रवास किया जाता है|
गाँव का पौराणिक नाम "मणिभद्र" है | कहा जाता है इस गाँव को भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त है |
माणा गाँव टूरिस्ट के लिए एक आकर्षण का केंद्र है, टूरिस्ट यहाँ अलकनंदा और सरस्वती का संगम देखने के लिए आते है| इसके अलावा गणेश गुफा व्यास गुफा और भीम पुल यहाँ टूरिस्ट के बीच आकर्षण का केंद्र है |वर्तमान मे उत्तराखंड सरकार इसे हेरिटेज विलेज के रूप मे विकसित कर रही है जिसके लिए साथ करोड़ का बजट सरकार द्वारा पास हो चुका है |
व्यास गुफा
व्यास गुफा माणा गाँव के ऊपर 200 मीटर की दूरी पर एक विशाल पत्थर जो पुस्तकों के पन्नों की तरह दिखता है|महाभारत की कथा के एक - एक चरित्र अपने आप में अनूठे है. कहा जाता है कि ये वही गुफा है जिसमे रहकर महर्षि वेद व्यास ने हजारों वर्ष पहले अद्भुत महाकाव्य महाभारत की रचना की थी,ये गुफा व्यास गुफा के नाम से जाना जाता है |
गणेश गुफा
व्यास गुफा से कुछ दूर पर गणेश गुफा स्थित है, कहा जाता है कि महाभारत को आज से करीब 5000 साल पहले महर्षि वेद व्यास के दिशा निर्देश पर भगवान गणेश ने बैठकर महाभारत लिखी थी, ये गुफा गणेश गुफा के नाम से जाना जाता है|
मुचकुंद गुफा
यह बहुत बड़ी गुफा है | और बहुत नीचे तक फैली है | टूटे फूटे पत्थर खण्ड इस गुफा मे भरे हैं|
भीतर वर्षा का जल भी भर जाता है, जन्माष्ठमी के दिन यहाँ पर बहुत से लोग आते है|
मुचकुंद भगवान राम के पूर्वज थे। असुरों के खिलाफ देवों की साहयता करने पर उन्होंने इंद्रदेव से बिन-अवरोध निद्रा मांगी थी। साथ में अंतर्गत किया गया कि जो भी निद्रा भंग करेगा, वह तुरंत भस्म हो जाएगा। इसके बाद वह इस गुफा में चले गए।
कालयवन राक्षस भगवान कृष्ण के पीछे पड़ गया था। कालयवन से पीछा छुड़ाने के लिए भगवान कृष्ण उसी गुफा में आ गए, जहां मुचकुंद निद्रा में थे। कालयवन वहां भी आ गया और उसने अंधेरे में मुचकुंद को ललकार दिया। मुचकुंद की दृष्टि कालयवन पर पड़ गई और वह वहीं भस्म हो गया।
जय श्री हरि
||अन्यत्र मरणामुक्ति: स्वधर्म विधिपूर्वकात || |||बदरीदर्शनादेव मुक्ति: पुंसाम करे स्थिता ||
अर्थात अन्य तीर्थों में तो स्वधर्म का विधिपूर्वक पालन करते हुए मृत्यु होने से ही मनुष्य की मुक्ति होती है, किन्तु बद्री विशाल के दर्शन मात्र से ही मुक्ति उसके हाथ में आ जाती है।
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Jai Badri Vishal
ReplyDeleteजय बद्री विशाल
Deleteबहुत सुंदर ♥️
ReplyDeleteधन्यवाद|
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