Sunday, August 9, 2020

पूरे भारतवर्ष का एक ऐसा स्थान जहा वर्जित है हनुमान जी की पूजा

पूरे  भारतवर्ष  में एकमात्र ऐसा स्थान, जहाँ नहीं होती हैं हनुमान जी की पूजा, चलो आज आपको भारतवर्ष में एक ऐसी जगह के बारे में बताते हैं  जहाँ  पर नहीं पूजे जाते हैं हनुमान जी, यहाँ तक की हनुमानजी का नाम भी यहाँ के लोगों द्वारा नहीं लिया जाता है, और यह स्थान है - दूनागिरी गांव | दूनागिरी गांव उत्तराखंड राज्य के चमोली जिले के जोशीमठ ब्लॉक में स्थित है,
 जो की सुदूर हिमालय की गोद में बसा, भारत चीन सीमा के पास स्थित एक छोटा सा गावं है| यह गावं उत्तराखंड की राजधानी देहरादून  से 341.3 किलोमीटर दूर है| यहाँ पर लोगों का बासव साल के सिर्फ 6 महीने होता है व बाकी के 6 महीने ये लोग अलकनंदा की निचली घाटी में निवास करते है| भोटिया जनजाति के लोगों के द्वारा मुख्य रूप से यहाँ पर ऋतू प्रवास किया जाता है| यह पूरा क्षेत्र पश्चिमी धौली गंगा की घाटी में आता है| दूनागिरी  गांव पूरे भारत में एकमात्र ऐसा गांव हैं जहा  के लोग आज भी हनुमान जी को नहीं पूजते है, जिसका प्रसंग रामायण से जुड़ा है| जब लक्षमण जी को युद्ध में शक्ति लगी थी तो सुसैन वैध द्वारा हनुमान जी को संजीवनी बूटी के लिए सुदूर हिमालय में भेजा गया था| लेकिन आज दूनागिरी गावं के लोगो का यह मानना है कि हनुमान जी ने उनके गांव से संजीवनी बूटी की जगह द्रोणागिरी पर्वत का आधा हिस्सा उठा लिया था, द्रोणागिरी पर्वत इस गावं के इष्ट देवता के रूप में पूजे जाते है व प्रत्येक वर्ष जून के माह में गावं  वासियो के द्वारा द्रोणागिरी पर्वत कि पूजा कि जाती है, यहाँ के लोग मानते है कि हनुमान जी द्वारा उनके देवता की दाहिनी भुजा को उखाड़ कर ले जाया गया था जिस कारण यहाँ के लोग हनुमान जी से आज भी नाराज हैं| यहाँ के लोगो में यह मान्यता है की द्रोणागिरी  पर्वत पूरे क्षेत्र के लोगो की आजीविका का मुख्य साधन बन सकता था लेकिन  हनुमानजी ने पूरा पर्वत ही ले जाकर संजीवनी बूटी का इस गांव से अस्तित्व ही समाप्त कर दिया हैं |बाल्मीकि द्वारा रचित रामायण के अनुसार हनुमान जी द्वारा पर्वत को वापस यथास्थान रख दिया गया था लेकिन तुलसीदास द्वारा रचित रामायण में यह लिखा गया है की हनुमान जी द्वारा पर्वत को लंका में ही छोड़ दिया गया था लेकिन वास्तव में द्रोणागिरी पर्वत का वह हिस्सा आज भी खाली है|  द्रोणागिरी पर्वत के खाली स्थान को लोगों के द्वारा आज भी प्रत्यक्ष रूप से देखा जाता है| आज के परिपेक्ष में लोगों का यह मानना है कि यदि हनुमान जी द्वारा संजीवनी पर्वत के हिस्से को उसी स्थान पर वापस रख दिया जाता तो, संजीवनी बूटी इस क्षेत्र की आजीविका का मुख्य साधन बन सकता था| साथ ही साथ इन चमत्कारी बूटियों से लाइलाज बीमारियों कि दवाइयां बनायीं जा सकती थी| वर्त्तमान समय में कोरोना जैसी महामारी कि दवाई के लिए पूरे भारतवर्ष को ही नहीं बल्कि पूरे विश्व को इतना लम्बा संघर्ष और इंतज़ार नहीं करना पड़ता और साथ ही साथ पूरे मानव जाति को ऐसी भयंकर महामारियों से बचाया जा सकता था |                                                                                                                                        धन्यवाद 

 

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